हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, क़ुम, ईरान में आयोजित इस शैक्षिक एवं वैचारिक बैठक में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक और टेलीविजन बहसों में भाग लेने वाले हुज्जतुल इस्लाम सैयद आसिफ़ रिज़वी ने उलेमा और धर्म प्रचारकों की जिम्मेदारियों, वर्तमान दौर में धर्म प्रचार के महत्व, सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य करने तथा आधुनिक संचार माध्यमों के प्रभावी इस्तेमाल पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि धर्मगुरुओं और प्रचारकों की जिम्मेदारी केवल धार्मिक जानकारियां पहुंचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि धार्मिक शिक्षाओं को ईमानदारी, सूझबूझ और विवेक के साथ समाज के हर वर्ग तक पहुंचाना भी उनके प्रमुख कर्तव्यों में शामिल है।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि धर्मगुरु, ईश्वर की ओर से दिए गए धार्मिक संदेश और समाज के बीच एक महत्वपूर्ण माध्यम की भूमिका निभाता है। जिस प्रकार प्यासे व्यक्ति को पानी की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार समाज के अनेक लोगों को सही धार्मिक मार्गदर्शन, वैचारिक स्पष्टता और आध्यात्मिक संतुष्टि की जरूरत होती है। ऐसे में उलेमा की जिम्मेदारी है कि वे धार्मिक शिक्षाओं को पूरी ईमानदारी के साथ लोगों तक पहुंचाएं और उन्हें इस प्रकार प्रस्तुत करें कि वे लोगों के वैचारिक और व्यावहारिक जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकें।
मैदानी स्तर पर उलेमा की सक्रिय भूमिका आवश्यक
हुज्जतुल इस्लाम सैयद आसिफ़ रिज़वी ने जोर देकर कहा कि धर्मगुरु और प्रचारक की भूमिका केवल शिक्षण संस्थानों, मिंबर या शैक्षिक सभाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें समाज के व्यावहारिक क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब समाज को धार्मिक मार्गदर्शन की आवश्यकता हो, लोग वैचारिक उलझनों या संदेहों का सामना कर रहे हों और सही जानकारी उपलब्ध कराना समय की महत्वपूर्ण जरूरत बन जाए, तो धर्मगुरुओं को समय पर अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
उनके अनुसार, धर्म प्रचार की मांग है कि उलेमा परिस्थितियों से अवगत रहें, लोगों के सवालों को समझें और प्रत्येक अवसर पर अपनी शैक्षिक एवं नैतिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए तैयार रहें। यदि किसी महत्वपूर्ण अवसर पर विद्वानों की आवाज सामने नहीं आती, तो वैचारिक रिक्तता पैदा हो सकती है, जिसे अप्रमाणित जानकारियां और गलतफहमियां भर सकती हैं। इसलिए समय पर उपस्थित होना, परिस्थितियों को समझना और जिम्मेदारी के साथ अपनी बात रखना धर्म प्रचार के महत्वपूर्ण अंग हैं।
भाषा, परिस्थितियों और आधुनिक संचार माध्यमों की समझ
अपने संबोधन के एक महत्वपूर्ण हिस्से में उन्होंने वर्तमान दौर की आवश्यकताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आज के धर्मगुरुओं और प्रचारकों के लिए भाषाओं, परिस्थितियों और संचार माध्यमों की समझ असाधारण महत्व रखती है। केवल ज्ञान का होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि व्यक्ति अपने ज्ञान को श्रोताओं की भाषा, समझ और मानसिक स्तर के अनुरूप प्रस्तुत करने का कौशल रखता हो।
उन्होंने कहा कि आज संचार के माध्यम तेजी से बदल रहे हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने जानकारी पहुंचाने को आसान और व्यापक बना दिया है, लेकिन इनके गैर-जिम्मेदाराना इस्तेमाल से गलतफहमियां, निराधार दावे और भ्रामक विचार भी फैल सकते हैं। ऐसे में उलेमा और धर्म प्रचारकों को इन माध्यमों की उपेक्षा करने के बजाय उनका सकारात्मक, रचनात्मक और विवेकपूर्ण इस्तेमाल करना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि समय एक मूल्यवान पूंजी है। आधुनिक संचार माध्यमों का इस्तेमाल अनावश्यक गतिविधियों में समय बिताने के बजाय ज्ञानवर्धन, धार्मिक शिक्षाओं के प्रचार, संदेहों के समाधान और समाज के वैचारिक प्रशिक्षण के लिए किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, यदि विरोधी या गैर-जिम्मेदाराना विचारों को फैलाने वाले लोग संचार माध्यमों का इस्तेमाल अपने उद्देश्यों के लिए कर रहे हैं, तो विद्वानों की जिम्मेदारी है कि वे भी इन्हीं माध्यमों के जरिए प्रमाणिक जानकारी, तर्कपूर्ण संवाद और विवेकपूर्ण शैली में अपना संदेश लोगों तक पहुंचाएं।
जिहाद-ए-तबयीन: तथ्यों की स्पष्ट व्याख्या और वैचारिक मार्गदर्शन
हुज्जतुल इस्लाम सैयद आसिफ़ रिज़वी ने अपने संबोधन में शहीद रहबर आयतुल्लाह सैयद अली खामेनेई द्वारा प्रस्तुत ‘जिहाद-ए-तबयीन’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए इसके महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जिहाद-ए-तबयीन का मूल उद्देश्य तथ्यों को स्पष्ट करना, गलतफहमियों को दूर करना, घटनाओं और परिस्थितियों की सही समझ प्रस्तुत करना तथा समाज को वैचारिक और संचार संबंधी भ्रम से बाहर निकालने का गंभीर प्रयास करना है।
उनके अनुसार, वर्तमान दौर में सूचनाओं की अधिकता के बावजूद सही और प्रमाणिक जानकारी तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती है। ऐसे वातावरण में धर्मगुरुओं और प्रचारकों को किसी खबर या घटना पर चर्चा करते समय शोध, ईमानदारी और शैक्षिक सावधानी को प्राथमिकता देनी चाहिए। भावनात्मक प्रतिक्रिया, अप्रमाणित सूचनाओं और केवल दावों को दोहराने के बजाय तथ्यों के आधार पर बात करना प्रभावी धर्म प्रचार और जिम्मेदाराना स्पष्टीकरण की पहचान है।
उन्होंने आगे कहा कि जिहाद-ए-तबयीन का अर्थ केवल विरोधी विचारों का जवाब देना नहीं है, बल्कि सही विचारों को स्पष्ट करना, धार्मिक ज्ञान की व्याख्या करना, लोगों के मन में उठने वाले सवालों का उत्तर देना और तथ्यों को उनके सही संदर्भ में प्रस्तुत करना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस क्षेत्र में सफलता के लिए ज्ञान, सूझबूझ, तर्कशक्ति, भाषा पर अधिकार और संचार माध्यमों के प्रभावी इस्तेमाल की आवश्यकता है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में व्यावहारिक अनुभवों का उल्लेख
अपने संबोधन के दौरान हुज्जतुल इस्लाम सैयद आसिफ़ रिज़वी ने अंतरराष्ट्रीय, विशेषकर भारतीय मीडिया में अपनी भागीदारी के अनुभव भी साझा किए। उन्होंने ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध तथा ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों के संदर्भ में मीडिया में हुई चर्चाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि ऐसे संवेदनशील हालात में जनता तक सही जानकारी पहुंचाना और विभिन्न विचारधाराओं पर आधारित दावों का तर्कपूर्ण जवाब देना कितना महत्वपूर्ण हो जाता है।
उन्होंने कहा कि कभी-कभी इस्लाम, मक्तबे अहलेबैत (अ.), शिया समुदाय और ईरान के संबंध में ऐसे विचार प्रस्तुत किए जाते हैं, जिनमें घटनाओं की एकतरफा व्याख्या या अप्रमाणित दावों के जरिए जनमत को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में आवश्यक है कि विद्वान अपनी जिम्मेदारी को समझें और जहां उनकी शैक्षिक एवं वैचारिक मार्गदर्शन की आवश्यकता हो, वहां उपस्थित होकर तथ्यों को स्पष्ट करें।
उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर बताया कि वे विभिन्न भारतीय टेलीविजन चैनलों की बहसों में शामिल हुए, जहां अलग-अलग देशों और विचारधाराओं से जुड़े विश्लेषकों के बीच चर्चा होती थी। इन अवसरों पर उनका प्रयास रहा कि वे ईरान की स्थिति, युद्ध की पृष्ठभूमि और क्षेत्रीय परिस्थितियों के संबंध में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करें, गलतफहमियों को दूर करें तथा इस्लाम और मक्तबे अहलेबैत (अ.) से संबंधित सवालों का तर्कपूर्ण उत्तर दें।
उनके अनुसार, इन अनुभवों से यह बात और स्पष्ट हुई कि आज धर्म प्रचार के क्षेत्र में केवल पारंपरिक तरीकों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि उलेमा और धर्म प्रचारक आधुनिक संचार माध्यमों की भाषा और जरूरतों को समझें, महत्वपूर्ण अवसरों पर अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करें तथा शैक्षिक और नैतिक जिम्मेदारी के साथ लोगों का मार्गदर्शन करें।
ज्ञान, ईमानदारी और जिम्मेदारी की आवश्यकता
संबोधन के अंत में इस बात पर जोर दिया गया कि धर्मगुरु और प्रचारक की सफलता का मापदंड केवल प्रभावशाली भाषण या अधिक जानकारी होना नहीं है, बल्कि संदेश की प्रमाणिकता, बयान में ईमानदारी, परिस्थितियों की सही समझ और समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से उसका जुड़ाव भी महत्वपूर्ण है। एक जिम्मेदार धर्मगुरु वह है, जो अपने ज्ञान का इस्तेमाल समाज के वैचारिक और नैतिक सुधार के लिए करे, लोगों के सवालों से परिचित रहे, जरूरत के समय सक्रिय भूमिका निभाए और आधुनिक संसाधनों का सकारात्मक उद्देश्यों के लिए उपयोग करे।
वर्तमान दौर में उलेमा और धर्म प्रचारकों के सामने व्यापक कार्यक्षेत्र मौजूद है। एक ओर धार्मिक ज्ञान का प्रसार, युवा पीढ़ी का वैचारिक प्रशिक्षण और सामाजिक समस्याओं को समझने की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर डिजिटल संचार माध्यमों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के जरिए प्रसारित होने वाली सूचनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन करना तथा सही तथ्यों को सामने लाना भी उनकी जिम्मेदारी है।
यही वह बिंदु है, जहां ज्ञान, सूझबूझ, भाषा की समझ, परिस्थितियों की पहचान और जिहाद-ए-तबयीन एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। यदि उलेमा और धर्म प्रचारक इन आवश्यकताओं को समझते हुए अपनी जिम्मेदारियां निभाएं, तो वे न केवल धार्मिक संदेश को अधिक प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंचा सकते हैं, बल्कि समाज में वैचारिक जागरूकता, ज्ञान पर आधारित विश्वास और जिम्मेदार संवाद को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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